‘बड़ा प्यारा एड था’ से शुरू ‘संघी साले मूर्ख होते हैं’ पर खत्म: चरसी वामपंथनों का कारनामा आया सामने

TREANDING

सावन में अंडे से सर निकाल कर बाहर झाँकती वामपंथन, भादो में बोली ‘गे माय एहन बाइढ़ त देखबे नै कैलों!’ मतलब, ‘Oh my dog! Never seens this kinds of floods… Oh mah gods!’ यही वामपंथने आहें भर रही हैं कि 2014 के बाद से देश का माहौल खराब हो गया है और ऐसे संवेदनशील माहौल में एक उम्मीद की किरण आई थी तनिष्क के विज्ञापन के रूप में, जो कि मूर्ख संघियों को पच नहीं रही।

एड पर तो बाद में बात करेंगे, पहले स्वीकार्यता के लिए तरसती इन वामपंथनों पर बात करेंगे जो कई स्तर पर फ्रस्ट्रेटेड रहती हैं। इनका नकलीपना ‘पिंक’ और ‘हॉट पिंक’ से ले कर ‘नो नो नो नो नो… ये ग्रीन नहीं है, ये बॉटल ग्रीन है’ नापने में बीतता है। यही चरसी वामपंथनें आपको गरीबी पर कविता करती भी दिखेंगी और यही वामपंथनें तापसी पनु के कमर तक पानी में खड़े हो कर इनफिनिटी पूल पर ब्रेकफास्ट के टेबल पर अंडे के पॉच देख कर ‘ओ मा गॉड ताप्सी इज स्लेइंग इट’ भी कहती हैं।

इनके ‘रिक्शावाले की व्यथा’ पर लिखे पोस्ट देख कर आपको आत्मग्लानि होने लगेगी और तभी ये लिख देंगी कि ‘तनिष्क के जूलरी खरीदने की औकात है नहीं, चले हैं बॉयकॉट करने!’ अरे दीदी पहले डिसाइड कर लो कि गरीबों की इज्जत करती हो कि समय देख कर अपनी एलीटिज्म दिखानी है। किसी को एक जीवनशैली पसंद हो, पैसे हों तो घूमने, खाने, या नग्न हो कर नहाने में कोई समस्या नहीं, लेकिन वही व्यक्ति ये सब करते हुए दिखाता भी है स्वयं को, या ऐसा करने वालों को देख कर आहें भरता है, फिर वो गरीब मजदूरों के ऊपर एक ट्वीट कर देता है कि वो भी माइग्रेंट है, तब दिमाग भन्ना जाता है।

पूरा जीवन इसी दोगलेपन की निर्लज्जता में बैलेंस बनाने में बीतता है और बाद में डिफेंड करेंगे कि अमीर होने का मतलब ये नहीं कि गरीबों की व्यथा वो नहीं समझ सकते। लेकिन फ्रस्टू गँजेड़न वामपंथन दूसरे ही दिन लिख देगी कि जिसके अपने पत्नी-बच्चे नहीं, वो क्या जानेगा परिवार का दर्द। इनका वश चले तो कह देंगे ‘जा के पाँव न फटी बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई’ गलत है, हमने फोटो देखी है बिवाई की, तो हमें दर्द भी मालूम है, और जिनके फटी है उनसे ज्यादा मालूम है।

क्या विज्ञापन का विरोध करने वाले वाकई मूर्ख हैं?
विज्ञापन का विरोध करने वाले वो हैं जो देर से जगे हैं। वो मूर्ख नहीं हैं, वो बस सहिष्णु हैं, और अभी तक सिर्फ सहिष्णुता ही दिखाते रहे क्योंकि पिछले दौर में कुछ भी बोलने को ‘साम्प्रदायिक’ माना जाता था। लम्बे समय से ये नौटंकी चलती रही कि एक खास मजहब अपने उन्माद का उन्मुक्त प्रदर्शन करता रहे और तुमने कुछ कह दिया तो तुम कम्यूनल हो जाते थे। अब वो दौर गायब हो रहा है।

हिन्दुओं में एक नई ऊर्जा का संचार हो रहा है जहाँ वो अब यह देख रहे हैं कि उनके धार्मिक प्रतीकों पर किस-किस तरीके से, उसे विज्ञापन, वेब सीरिज, फिक्शन आदि के छद्मावरण के साथ प्रस्तुत किया जाता है। तुरंत ही उस पर कोई सवाल पूछ देता है, कोई तर्क रखता है, और फिर उस पर एक चर्चा शुरू हो जाती है। पहले ये चर्चा हो ही नहीं पाती थी और हर नैरेटिव एकतरफा होता था।

अब हिन्दू यह भी पूछ रहा है कि पाँच दशक पहले की फिल्मों में हर ब्राह्मण चोर, ठग या व्यभिचारी ही क्यों दिखाया जाता था? अब उसे यह जानने में दिलचस्पी है कि हर बार कोई मुस्लिम पात्र शेर खान या अब्दुल के बाप की तरह हरिश्चंद्र से ज्यादा सत्यवादी और ईमानदार कैसे हो जाता था? अब उसे यह पता लगाना है कि हर लाला किसी के माँ के कंगन क्यों ले लिया करता था सूदखोरी करते हुए? अब उसे यह जानना है कि पूरी मुंबई दाऊद, शकील जैसे बड़े और छोटे गुंडों से भरी होती थी, लेकिन फिल्मों का डॉन हमेशा हिन्दू ही क्यों हुआ करता था?

तनिष्क के विज्ञापन से ले कर ‘पाताल लोक’ वेब सिरीज तक, एक मजहब को ग्लैमराइज किया गया है और दूसरे धर्म को ब्राह्मण कान पर जनेऊ चढ़ा कर व्यभिचार करता दिखाया जाता है। ये किसी समानांतर ब्रह्मांड में ही संभव है कि ‘लव जिहाद’ को मेनस्ट्रीम बना चुका मजहब अपने घर में हिन्दू बहू की गोदभराई की रस्म कराता होगा और ब्राह्मण कान पर जनेऊ रख कर पराई स्त्री के साथ सेक्स।

आप सोचिए कि किस तरह की विकृत मानसिकता वाले लोग इस तरह के कॉन्सेप्ट पर काम करते होंगे! किस मुस्लिम घर में आपने सुना है कि हिन्दू की लड़की गई और उसका निकाह बिना मजहब स्वीकारे हुआ है? ऐसे परिवारों का प्रतिशत कितना है? फ्रस्टू वामपंथनों से पूछेंगे तो वो कह देंगी कि ‘ये एड उम्मीदों से भरा हुआ था’। तुम्हारी उम्मीद की हर स्कीम में हिन्दू की ही बेटी क्यों दिखती है मुस्लिम लड़कों के साथ? कभी मुस्लिम बेटी भी दिखाओ जिसके गाल पर हिन्दू लड़का गुलाल मल रहा हो…

क्या हिन्दू लोग कट्टर हो रहे हैं?
अपने सम्मान, धर्म, धार्मिक चिह्नों या उससे जुड़े विषयों पर मुखर हो कर बोलना कट्टरता नहीं है। हिन्दू थे तो एड को हटवाया, समुदाय विशेष के होते तो बेंग्लुरु के दंगों की तरह शोरूम जला देते। शार्ली एब्दो का याद कर लीजिए और ब्रूसेल्स से ले कर मैनचेस्टर तक, यूरोप के हर शहर में हुए धमाकों, नीस से ले कर पेरिस तक लोगों के ऊपर ट्रक चढ़ाने और लंदन के पुलों पर चाकूबाजी की घटनाएँ याद कर लीजिए।

इसलिए, कट्टरता की परिभाषा फिर से समझने की जरूरत है। लेकिन दीदी अल्पसंख्यक वाला कार्ड खेल जाएगी क्योंकि चरसी वामपंथन का पूरा जीवन उर्दू के दस शब्द पढ़ने और फेसबुक पर लिखने में बीता है। वो बताएगी कि ‘ऐसे संवेदनशील समय में जब स्कोडा की जरूरत थी तो लहसुन बोया जा रहा है’। अरे! बो तो हम धनिया देंगे, और वहाँ बोएँगे जहाँ प्रकाश संश्लेषण की रसायनिक क्रिया संभव नहीं, लेकिन हम कायदे में रहना जानते हैं।

ये नकली लोग दो-चार शब्द सीख लेते हैं जिसमें ‘संवेदनशील’, ‘अल्पसंख्यक’, ‘समाज’, ‘आज का दौर’, ‘ऐसे समय में’, ‘संघी’ आदि प्रमुख हैं, उसी को सस्ती लोकप्रियता के लिए, स्वादानुसार लेखों में गार्निशिंग के तौर पर छिड़क कर हिरोइन बनी फिरती हैं। नीचे ठरकी लौंडे ‘वाह मैम, क्या लिखा है… आज के दौर में आपसे बेहतर इन मुद्दों पर कौन लिख पाया है’, ‘अरे मैम, बिल्कुल मेरी सोच थी, ये संघी कहाँ से समझेंगे आज के दौर की नाजुकता को। आपने बेहतरीन लिखा है।’ लिख कर मजे लेते हैं।

फिर ऐसे लेखों को अपने वॉल पर मजे लेने के लिए ये दुष्ट लौंडे शेयर कर देते हैं, वामपंथन 15 शेयर को ‘पूरे भारत में पढ़ा गया’ और 30 शेयर को ‘अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वायरल हो गया’ मान कर नेत्रों के कोर के काजल को सर पर लगा कर ‘काली माय की जय’ कर देती है। आकाशगंगा के दूसरे छोर पर दिमाग को सूखने छोड़ कर फेसबुक पर स्वीकृति के लिए लाइक-लव पाने की आस में कटोरा लिए ऐसी वामपंथन के हर कमेंट पर जब दूसरे विचार के लोग ट्रोल करते हुए ‘हा-हा’ गिराने लगते हैं तो वामपंथन समूह नाराज हो जाता है।

तब ये लोग विक्टिम कार्ड निकालते हैं या फिर स्वयं के विचारों से इतर कुछ न सुन पाने में अक्षम मक्षिकामस्तिष्कधारिणी ये वीरांगनाएँ तुरंत ‘मिडिल फिंगर’ दिखाने की सलाह देती पाई जाती हैं। जिसको जो दिखाना है, दिखा दो, किसने रोका है? लेकिन हाँ, जब ऐसे में कोई दूसरा तुम्हें कुछ कह दे तो उस पर अश्लीलता का इल्जाम मत लगाना।

कट्टरता तो इनके विचारों में होती है। हिन्दू तो बस जगा है और पहचान रहा है कि कहाँ-कहाँ और कैसे-कैसे अजेंडा पेला जा रहा है। तनिष्क की साइट पर ‘हिन्दू’ शब्द सर्च करने पर जहाँ शून्य परिणाम आए, वहीं ‘मुस्लिम’ लिखने पर तीन सौ से ज्यादा प्रोडक्ट थे। ये क्या नौटंकी है? जब नेट पर शेयर होने लगी बात, तो तुरंत उन्होंने उसे ‘हर दुल्हन के लिए’ लिख कर उन प्रोडक्ट्स के बारे में जानकारी को ‘सेकुलर’ से ‘कम्यूनल’ बनाया।

वामपंथन चाचियाँ इससे भी फ्रस्ट्रेटेड हैं कि तनिष्क वाले इन संघियों से डर क्यों गए? ऐसा है, चाची जी कि दुर्गापूजा से ले कर दीवाली-छठ, अक्षय तृतीया तक और पूरे साल, गहने खरीदने वाले कौन हैं, ये बात तनिष्क को अच्छे से पता है। जिनको कन्फ्यूजन था कि ‘छपाक’ फिल्म को ये संघी कैसे फ्लॉप करवाएँगे, वो जा कर बॉक्स ऑफिस के आँकड़े देख लें।

उन्हें भी पता है कि कौन पंचर साटता है, और कौन आभूषण खरीद सकता है। हर व्यापारी को, हर फिल्म निर्माता को इस बात का अहसास होना चाहिए कि उनके करोड़ में अस्सी लाख कौन देता है। उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि बीस लाख के बिज़नेस के लिए अस्सी लाख के देवी-देवताओं पर हमला करने का परिणाम क्या होता है। हर उस साम्प्रदायिक वामी-कामी-इस्लामी कट्टरपंथी सोच वाले, और उनके समर्थकों के मनोमस्तिष्क पर स्पष्ट तौर पर यह बात छप जानी चाहिए कि भारत में व्यापार करना है तो जबरदस्ती का सेकुलरिज्म नहीं चलेगा, जिसका मतलब यह होता है कि हिन्दुओं के प्रतीकों पर हमला बोलो, मुस्लिमों को तेल लगाओ।

जिसको, जहाँ तेल लगाना है, लगाओ, मसाज करो, हमें कोई मतलब नहीं। लेकिन, हमारे प्रतीकों पर हमला करोगे, ‘लव जिहाद’ जैसे कुकृत्यों को ग्लैमराइज करने की कोशिश करोगे तो हम तुम्हें बताएँगे कि समस्या कहाँ है। फिर उन्हीं तीन फीट चौड़ी गलियों में ठेले पर रत्नजड़ित अंगूठियाँ बेचते रहना जहाँ कबूतर भी उड़ता है तो इधर-उधर टकराता रहता है।

बात एक विज्ञापन की है ही नहीं
बात यह नहीं है कि ‘यार एक विज्ञापन ही तो था, ये ओवर रिएक्ट कर रहे हैं हम लोग’, बात यह है कि तुम पीछे की बात भूल रहे हो। यह एक शृंखलाबद्ध तरीके से, लगातार, कभी डिटर्जेंट में, तो कभी चाय के नाम पर हिन्दुओं में आत्मग्लानि भरने का कुत्सित प्रयास है। यह ऐसा दिखाने का प्रयास है कि ‘देखो, वो तो अपने घर में गोदभराई करा रहे हैं’, जबकि वास्तव में वो लड़की अपने ससुर, देवर, जेठ और पति के दोस्तों के लगातार सामूहिक बलात्कार का शिकार हो कर, एक दिन सूटकेस में किसी नदी में बहती मिलती है।

दिखाया यह जाता है कि ‘अफरोज तो राहुल को घर बुला कर सेवइयाँ खिला रहा है’ लेकिन होता यह है कि अफरोज अपने पाँच दोस्तों के साथ राहुल की हत्या कर देता है क्योंकि उसने उसकी बहन से प्रेम किया था। दिखाया जाता है कि ‘बुर्के वाली पड़ोसन की चाय की खुशबू कमाल की है’, होता यह है कि वही बुर्के वाली कश्मीर में हिन्दुओं के नरसंहार के समय चिल्ला-चिल्ला कर बताती है कि किस घर के किस फ्लोर पर चावल के डिब्बे में वही पड़ोसी बैठा हुआ है। पटाक्षेप कुछ यूँ होता है कि पति को गोली मारी जाती है, पत्नी को बंदूक की नोक पर रक्त से सने चावल खिलाए जाते हैं।

जो है ही नहीं, वो दिखा कर हिन्दुओं को गिल्ट ट्रिप पर क्यों भेज रहे हो? आज के दौर की, और हर उस दौर और समय की सच्चाई यही है कि एक मजहब ऐसा है जो दुनिया के किसी भी कोने में दूसरे धर्म या रिलीजन के साथ शांति से रह ही नहीं सकता। ये जहाँ पहुँचता है, वहाँ रेप की वारदातें अचानक से बढ़ जाती हैं। स्वीडन एक अच्छा उदाहरण है। इन्हें रहने को जगह दो, तो दो पीढ़ी के बाद ये आपको आपके ही घर पर ‘ये मकान बिकाऊ है’ लिखने पर मजबूर कर देते हैं।

कभी विज्ञापन या फिल्म में यह तो दिखा नहीं। इसी मानसिकता पर किताब आई तो उसको ब्लॉक करवा दिया। इसलिए, बात कभी भी एक विज्ञापन की न तो थी, न रहेगी। ये न तो आम है, न हो सकती है। जो है नहीं, वो मत दिखाओ। ‘आशा’ और ‘उम्मीद’ दिखानी है तो मेरे पास दसियों कहानियाँ हैं जहाँ हिन्दू बच्चियों को न्याय की दरकार है। आशा और उम्मीद दिखानी है तो इस मजहब में स्त्रियों के शिक्षा के स्तर के आँकड़े निकाल कर पूछो कि दस करोड़ की महिला आबादी में मात्र एक प्रतिशत को ही ग्रेजुएशन तक क्यों पढ़ाया जाता है?

लव जिहाद, रेप जिहाद आदि व्यवस्थित तरीके से समाज में घुलते उस जहर की तरह हैं जिसकी शुरुआत में उपेक्षा की गई कि ये तो कहीं-कहीं हो रहा है, प्यार करना गुनाह नहीं है। लेकिन, अब चाहे केरल हो या फिर कानपुर की जूही कॉलोनी, इसका विकृत रूप दिख रहा है। इसलिए, नहीं चाहिए मुस्लिम घर में हिन्दू बहू की गोदभराई की हिन्दू रस्म वाली नौटंकी क्योंकि ये न सिर्फ काल्पनिक है, बल्कि परोक्ष रूप से हिन्दुओं को नीचा दिखाने की कोशिश है। यहाँ यह दिखाया जा रहा है कि जिन पर तुम लव जिहाद के इल्जाम लगाते हो, वो तो हिन्दू लड़की को उसकी रस्में निभाने दे रहे हैं।

सच्चाई यह है कि हिन्दू लड़की हो, या हिन्दू लड़का हो, अगर वो मुस्लिम घर में जाते हैं तो पहली शर्त ही इस्लाम स्वीकारने की होती है। अपवादों को छोड़ दें, तो आपके लिए खोजना कठिन हो जाएगा। हो सकता है पहले छः महीने आपको स्वतंत्रता का बहकावा दिया जाए, लेकिन उसके बाद चाहे इमोशनल ब्लैकमेल कर के हो, या फिर तलाक की धमकी दे कर, मुस्लिम तो बनना ही पड़ता है।

इसलिए ये ढोंग स्वीकार्य नहीं है।

क्या राइट वाले लेफ्ट होते जा रहे हैं?
ऐसे सवाल भी कल ट्विटर पर देखने को मिले कि गैर-वामपंथी भी उन्हीं की राह पर जा रहे हैं। बात यह है कि जा रहे हैं तो समस्या क्या है? इस वामी-कामी-इस्लामी कट्टरपंथी गिरोह को भी तो समझ में आए कि उन्होंने जैसी कट्टरता, वैचारिक अनम्यता दिखाई है, वो सामने से आते हुए कैसी दिखती है। ये तो करना आवश्यक है ताकि इन वामपंथी शूकरों का मानमर्दन किया जा सके।

राइट या गैर-वामपंथी समूह के साथ यही समस्या है कि मार वामपंथियों को पड़ती है, दर्द इन्हें भी होने लगता है कि इतना मत मारो! जबकि, चाणक्य के वचनानुसार दुश्मनों की संततियों का भी विनाश अत्यावश्यक है। इनका समूल नाश होना चाहिए, किसी भी तरह की छूट देने की आवश्यकता नहीं है। तय करो कि रोना-गाना है या अनवरत पेलाई करनी है इनकी, फिर तय करो कि तुम्हें इसका हिस्सा बनना है कि नहीं।

बलराम की तरह महाभारत के युद्ध के अंतिम समय में गदायुद्ध के नियम तय मत करो। कुरुक्षेत्र में अभिमन्यु को जब मारा गया तब के अट्टहास याद करो। हिन्दू वही सोलह साल का किशोर है जिसकी मूँछों के रोम भी प्रकट नहीं हुए थे, और उसे तथाकथित महारथियों ने घेर कर मार डाला था। इसलिए, कर्ण अगर वैयक्तिक तौर पर सही भी है, फिर भी दुश्मन की तरफ से है तो पहिया निकालते वक्त उसके सर को धड़ से अलग करना न्यायोचित और धर्मानुसार किया गया कृत्य है।

तुम इन चक्करों में मत पड़ो कि ‘हम ओवररिएक्ट कर रहे हैं’ क्योंकि चोर की भीड़ द्वारा पिटाई को पूरे हिन्दू समुदाय पर फेंकना भी ओवररिएक्शन ही था, कठुआ के रेप का मसला ओवररिएक्शन से भी एक कदम आगे की बात थी, जुनैद की लिंचिंग एक फेक न्यूज थी, लेकिन वो तो आज भी नाम लेते ही हैं। फिर ये ‘हम ओवररिएक्ट कर रहे हैं’ क्या होता है? जब मौका मिले दबोचो, तुम्हें वामपंथियों की तरह तथ्यों को ‘मैनुफैक्चर’ करने की आवश्यकता भी नहीं, तथ्य तो हम दे रहे हैं तुम्हें, तुम रिएक्ट करना सीखो तो पहले।

पहले ही भावुक होने लगते हैं लोग! अरे, पहले इनको यह दिखाओ कि हमें समझ में आता है सब, फिर उस पर प्रतिक्रिया दो, फिर सामूहिक प्रतिक्रिया दो, फिर ब्रांड्स पर दबाव बनाना सीखो, फिर इन्हें ध्यान दिलाओ कि सामान कौन खरीदता है, फिल्में कौन देखता है, फिर अपने प्रण पर डँटे रहो कि इसकी फिल्म नहीं देखनी, इस ब्रांड का सामान नहीं लेना। जो देख ली, वो ठीक है, जो खरीद लिया वो ठीक है, लेकिन आगे का याद रखो।

संघी या भक्त कहलाने पर गौरव महसूस करो
जिनकी आँखें बजबजाते माहौल में हर रोज खुलती हों, जो बकरी के भेनारी (अपशिष्ट) के दुर्गंध में जीवन जीते हैं, जो वही टट्टी फेसबुक पर पढ़ते और लिखते हैं, वो इतने क्वालिफाइड नहीं है कि वो ‘संघी’ या ‘भक्त’ क्या होता है समझ सकेंगे। संघ ने देश के लिए क्या किया, और ‘भक्त’ कहे जाने वालों ने क्या नहीं किया, ये सबके सामने है। मूर्ख संघी को कम से कम यह तो समझ में आता है कि CAA का भारत के मुसलमानों पर कोई असर नहीं होने वाला, लेकिन स्वयं को फ्रस्टू वामपंथन विचारक भी मानती हैं, अपनी डिग्री की फोटोकॉपी भी फेंक कर मारती हैं, लेकिन उनको ये कानून समझ में नहीं आता।

भक्त कहे जाने वाले न तो अपने मंदिर पर ईंट-पत्थर जमा कर के रखते हैं, न ही अपनी बहू-बेटियों को कहते हैं कि छत से पेट्रोल बम फेंकना। भक्त कृष्ण भगवान को बलात्कारी कहे जाने पर भी चुप रहते हैं, नंबर प्लेट स्कैन कर के विधर्मियों की कार में न तो आग लगाते हैं, न ही ह्यूमन चेन की नौटंकी करते हैं। भक्त होना तो सौभाग्य है, वरना मजहबी शिक्षा देने वाले दीन और दाढ़ी वाले बच्चों को हिन्दू लड़कियों के साथ बलात्कार करने की शिक्षा तो खुलेआम दे ही रहे हैं।

जिनकी औकात नहीं है हमारे स्तर तक पहुँचने की, वो हमें किसी भी नाम से पुकारें, आपको तनिक भी फर्क नहीं पड़ना चाहिए। उन्हें अपने ही तरह के लोगों में स्वीकार्यता चाहिए इसलिए वो मुँह से भी मलद्वार का काम लेते हैं। जीवन ही दूसरों के द्वारा ‘सराहना’ पाने की उम्मीद पर टिका हुआ हो, पूरा गैंग एक तरह की बात कर रहा हो, तो उनके पास विकल्प नहीं हैं। ये सारे दोगले निजी बातचीत में आपको जता देंगे कि उन्हें भी पता है कि बीफ के लिए जुनैद की लिंचिंग फर्जी खबर थी, लेकिन फेसबुक पर लिखे पोस्ट में उदाहरण दे ही देंगे।

चरसी वामपंथनों की बातों का बुरा नहीं मानना चाहिए, उन्हें बस उनकी औकात दिखाते रहना चाहिए कि तुम्हारी अहमियत, तुम्हारे शब्दों का वजन शराबियों की महफिल में कहे गए चुटकुलों जितना है जिसका मजा सिर्फ वही ले पाते हैं जो नशे में नहीं हैं, और दुर्भाग्य यह कि वो भी चुटकुलों की गुणवत्ता पर नहीं, उसके घटिया होने के स्तर पर हँसते हैं। इसलिए, इनको लिखने दो और मजे लो। नीचे में लिखते रहो, ‘अरे मैम, इतनी गहरी और संवेदनशील बात, आपके सिवाय और लिख कौन पाता है’, ‘वाह मैम, ऐसे शब्द लिखने के लिए हिम्मत होनी चाहिए, वरना कई पढ़े-लिखे तो बस टाइमपास कर रहे हैं’, ‘जब से फेसबुक पर आया हूँ, जब से अकाउंट बनाया है, इससे बेहतर बात पढ़ी ही नहीं कहीं। इजाजत हो तो कॉपी कर लूँ?’

ऐसे मूढ़मतियों को पता भी नहीं चलता कि कौन संघी उनकी ले कर निकल गया, और कौन उनके स्क्रीनशॉट किस ग्रुप में लगा कर मजे ले रहा है। मैम को बस इससे मतलब है कि मेरा पोस्ट तो वायरल हो गया। सही बात है, अगर तीस शेयर होना वायरल होना है तो उस हिसाब से मेरे इस लेख को व्हर्लपूल या सोम्ब्रेरो मंदाकिनी नहीं, तो एंड्रोमेडा के किसी सौर परिवार के ग्रह पर कोई अवश्य पढ़ रहा होगा। या साकेत धाम में शेषसय्या पर लेटे भगवान विष्णु, पद्महस्ता, भुवनेश्वरी, हरिवल्लभा, विष्णुवक्षा माता लक्ष्मी के लेटेस्ट आइपैड प्रो पर अवश्य ही स्क्रॉल कर रहे होंगे। रीट्वीट तो मेरा मोदी जी भी नहीं करते, विष्णु जी तो नहीं ही करेंगे।

जय श्री राम!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *