तुर्की समर्थित “अजरबैजान” को हथियार बेच अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा है “इज़रायल”

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जैसे-जैसे दक्षिण Caucasus क्षेत्र के अर्मेनिया-अज़रबैजान विवाद में अंतर्राष्ट्रीय ताक़तें शामिल होती जा रही हैं, वैसे-वैसे यह विवाद और ज़्यादा पेचीदा होता जा रहा है। एक तरफ तुर्की समर्थित अज़रबैजान है तो दूसरी तरफ रूस समर्थित अर्मेनिया है। हालांकि, इस विवाद में अब कट्टर दुश्मन इजरायल और तुर्की एक पक्ष में आते दिखाई दे रहे हैं क्योंकि इज़रायल अज़रबैजान को हथियार सप्लाई कर रहा है। अज़रबैजान का समर्थन करने के पीछे इज़रायल के अपने कुछ कारण है, जिनके चलते वह अप्रत्यक्ष तौर पर तुर्की का समर्थन करने के लिए भी तैयार दिखाई दे रहा है।

दरअसल, ईरान में अज़रबैजानी तुर्कों की एक छोटी आबादी रहती है, जहां इज़रायल अज़रबैजान की सहायता से अलगाववाद की भावना पैदा कर ईरान के लिए मुश्किलें खड़ी करना चाहता है। इस स्थिति में इज़रायल को जहां तुर्की पर दबाव बनाने के लिए अज़रबैजान को अपनी सैन्य सहायता रोकनी चाहिए थी, वहाँ उसने सिर्फ ईरान के हितों को नुकसान पहुंचाने के लिए तुर्की की सहायता करना शुरू कर दिया है। स्पष्ट है कि यहाँ इज़रायल को अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव करने की ज़रूरत है, और तुर्की की सहायता कर इजरायल अपने ही वैश्विक दर्जे को कमजोर करने में लगा है।

बेशक इज़रायल और ईरान एक दूसरे के कट्टर दुश्मन हैं और दोनों देशों के पास एक दूसरे के हितों के खिलाफ काम करने का पूरा अधिकार है। हालांकि, यह भी उतना ही सच है कि तुर्की भी इज़रायल के लिए बड़ा खतरा है, शायद ईरान से भी बड़ा खतरा। इज़रायल की खुफिया एजेंसी मोस्साद भी तुर्की को “सबसे बड़ा खतरा” घोषित कर चुकी है। ऐसा इसलिए, क्योंकि तुर्की पिछले कुछ समय से कई मामलों पर इज़रायल के खिलाफ खुलकर बोल चुका है।

अज़रबैजान विवाद में तुर्की के शामिल होने के पीछे का कारण यही है कि एर्दोगन आज भी Ottoman empire की विरासत को पुनर्जीवित करने और खुद को खलीफ़ा प्रस्तुत करने की होड़ में लगे हैं और अपनी इन्हीं महत्वाकांक्षाओं के चलते उन्होंने हाल ही में एक बयान दिया था “जिस शहर को प्रथम विश्व युद्ध के चलते हमें छोड़ना पड़ा था, वहाँ अभी भी Ottoman की विरासत को पुनर्जीवित किया जा सकता है। यरूशलम हमारा शहर है, यह शहर हमसे बना है।” स्पष्ट है कि एर्दोगन की महत्वाकांक्षाओं को देखते हुए यह आसानी से कहा जा सकता है कि तुर्की ही आज इज़रायल के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

यहाँ इजरायल अगर इस गलतफहमी में है कि विवाद के समय अज़रबैजान तुर्की से ज़्यादा अहमियत इज़रायल को देगा, तो उसे तुरंत सच्चाई का सामना करने की ज़रूरत है। मुस्लिम बहुल अज़रबैजान किसी भी सूरत में अंकारा का समर्थन करना नहीं छोड़ेगा, इसके अलावा इस बात की भी पूरी-पूरी संभावना है कि अज़रबैजान ईरान के साथ भी हाथ मिला ले और वह खुद इज़रायल के लिए बड़ी मुश्किलें पैदा कर दे। पिछले कुछ समय में ईरान और अज़रबैजान के बीच भी रिश्ते बेहतर हुए हैं और ऐसे में अज़रबैजान का समर्थन कर इज़रायल अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम कर रहा है।

अर्मेनिया-अज़रबैजान विवाद में अगर अर्मेनिया का पक्ष कमजोर होता है तो इससे इस क्षेत्र में तुर्की को सीधा फायदा होगा, और भविष्य में मजबूत तुर्की, ईरान और अज़रबैजान के साथ मिलकर इज़रायल विरोधी गुट का निर्माण भी कर सकते हैं। ऐसे में कल इज़रायल के बेचे हथियार इज़रायल के खिलाफ ही इस्तेमाल में लाये जाएँगे, तो इससे किसी को कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए। इज़रायल अज़रबैजान की सहायता कर अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार रहा है और अगर उसने जल्द ही अपनी इस गलती को नहीं सुधारा तो भविष्य में उसे ही इसका बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

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